Ayurveda/आयुर्वेद

आयुर्वेद का इतिहास

आयुर्वेद का श्रेय धन्वंतरि को दिया जाता है , जो हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं के चिकित्सक थे, जिन्होंने इसे ब्रह्मा से प्राप्त किया था । इसकी शुरुआती अवधारणाएँ वेदों के उस हिस्से में बताई गई हैं जिसे अथर्ववेद ( लगभग दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व ) के नाम से जाना जाता है। वैदिक चिकित्सा का काल लगभग 800 ईसा पूर्व तक चला । वेदों में रोगों के उपचार के लिए जादुई प्रथाओं और पारंपरिक रूप से बीमारियों का कारण माने जाने वाले राक्षसों को भगाने के लिए मंत्रों का भरपूर वर्णन है। बताई गई मुख्य स्थितियाँ हैं बुखार ( तकमन ), खाँसी, क्षय रोग , दस्त , जलोदर (सामान्यीकृत शोफ ), फोड़े , दौरे, ट्यूमर और त्वचा रोग ( कुष्ठ रोग सहित )। उपचार के लिए अनुशंसित जड़ी-बूटियाँ कई हैं।

भारतीय चिकित्सा का स्वर्ण युग, ८०० ईसा पूर्व से लेकर १००० ईसवी तक, विशेष रूप से चिकित्सा ग्रंथों के निर्माण द्वारा चिह्नित किया गया था, जिन्हें ‘दस्यु’ के रूप में जाना जाता है।चरक-संहिता औरसुश्रुत-संहिता , जिसका श्रेय क्रमशः चरक, एक चिकित्सक और सुश्रुत , एक शल्य चिकित्सक को दिया जाता है। अनुमान है कि चरक-संहिता अपने वर्तमान स्वरूप में पहली शताब्दी ई.पू. से है, हालाँकि इसके पहले के संस्करण भी थे। सुश्रुत-संहिता संभवतः पिछली शताब्दियों ईसा पूर्व में उत्पन्न हुई थी और 7वीं शताब्दी ई.पू. तक अपने वर्तमान स्वरूप में स्थिर हो गई थी । वाग्भट को दिए गए ग्रंथ कुछ हद तक कम महत्व के हैं। भारतीय चिकित्सा पर बाद के सभी लेखन इन कार्यों पर आधारित थे, जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के साथ-साथ तीन शारीरिक द्रव्यों ( वात , पित्त और कफ )के संदर्भ में मानव शरीर का विश्लेषण करते हैं।

धन्वंतरि मुनि

धन्वंतरि चिकित्सा, जिसे हम आयुर्वेद के रूप में भी जानते हैं, एक प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है जो स्वास्थ्य के संपूर्ण विकास पर आधारित है। इसका उद्देश्य न केवल रोगों का इलाज करना है, बल्कि जीवनशैली में संतुलन और समग्र स्वास्थ्य बनाए रखना भी है। धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है, और उन्हें चिकित्सा के पहले विशेषज्ञ के रूप में सम्मानित किया जाता है। यहां धन्वंतरि चिकित्सा और आयुर्वेद के सिद्धांतों और उपचार पद्धतियों का विस्तार से विवरण दिया गया है:

आयुर्वेद के मूल सिद्धांत

आयुर्वेद में माना जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर में तीन प्रमुख दोष होते हैं – वात, पित्त, और कफ। इन दोषों का संतुलन हमारे स्वास्थ्य को निर्धारित करता है। आयुर्वेद के अनुसार:

1. वात (वायु): यह दोष शरीर के आंदोलनों और तंत्रिका तंत्र को नियंत्रित करता है।

2. पित्त (अग्नि): यह पाचन, चयापचय, और शरीर की ऊर्जा को संतुलित करता है।

3. कफ (जल): यह शरीर की स्थिरता, जोड़, और प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखता है।

धन्वंतरि चिकित्सा में इन्हीं तीन दोषों का संतुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न उपचार विधियाँ अपनाई जाती हैं। माना जाता है कि अगर इन दोषों में असंतुलन हो जाए, तो शरीर में रोग और विकार उत्पन्न होते हैं।

निदान प्रक्रिया

धन्वंतरि चिकित्सा में रोग का निदान करने के लिए आयुर्वेदिक वैद्य व्यक्ति की नाड़ी, त्वचा, आँखें, और जीभ की जांच करते हैं। इसके अतिरिक्त व्यक्ति के खान-पान, जीवनशैली, मनोवृत्ति, और दिनचर्या का भी निरीक्षण किया जाता है। रोग का मुख्य कारण पता लगाने के बाद वैद्य उचित उपचार और जीवनशैली में बदलाव के सुझाव देते हैं।

आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियाँ

धन्वंतरि चिकित्सा में कई प्रकार की उपचार पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं, जो मुख्यतः प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, तेलों, और ध्यान-योग पर आधारित हैं। कुछ प्रमुख उपचार पद्धतियाँ निम्नलिखित हैं:

1. पंचकर्म: यह आयुर्वेद का एक प्रमुख उपचार है, जिसमें शरीर से विषाक्त तत्वों को बाहर निकालने पर जोर दिया जाता है। पंचकर्म में पाँच प्रकार के उपचार शामिल होते हैं:

वमन (उल्टी द्वारा विषों का निकालना)

विरेचन (पेट से विषों को बाहर निकालना)

बस्ती (औषधीय एनिमा)

नस्य (नाक के माध्यम से औषधि देना)

रक्तमोक्षण (खून को साफ करना)

2. औषधीय उपचार: धन्वंतरि चिकित्सा में औषधीय जड़ी-बूटियों का विशेष महत्व है। हल्दी, अश्वगंधा, तुलसी, आंवला, शतावरी, आदि जैसी कई जड़ी-बूटियाँ आयुर्वेद में रोगों के उपचार के लिए उपयोग की जाती हैं। इनका उपयोग रोग के प्रकार और दोष के असंतुलन के आधार पर किया जाता है।

3. अभ्यंग (तेल मालिश): अभ्यंग आयुर्वेदिक तेलों से की जाने वाली एक विशेष मालिश है जो तनाव, थकान, और रक्त संचार को सुधारने में मदद करती है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने और कोशिकाओं को पुनर्जीवित करने में सहायक मानी जाती है।

4. ध्यान और योग: धन्वंतरि चिकित्सा में मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को संतुलित करने के लिए ध्यान और योग पर जोर दिया जाता है। ये मानसिक शांति, ऊर्जा का संतुलन, और समग्र स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायक माने जाते हैं।

5. आहार और आहार-शैली: आयुर्वेद में आहार का विशेष स्थान है। धन्वंतरि चिकित्सा में रोग के अनुसार आहार का निर्धारण किया जाता है, जिसमें संतुलित और पौष्टिक भोजन को प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ विशेष आहार नियम होते हैं, जैसे मौसम के अनुसार भोजन करना, ताजे और सजीव भोजन का सेवन करना, और तामसिक (भारी और आलसीपन बढ़ाने वाले) भोजन से परहेज करना।

रोगों का उपचार

धन्वंतरि चिकित्सा में प्रत्येक रोग का इलाज प्राकृतिक और जड़ी-बूटी आधारित तरीकों से किया जाता है। कुछ प्रमुख रोग जिनमें धन्वंतरि चिकित्सा लाभदायक मानी जाती है:

मधुमेह: आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों जैसे गुड़मार और करेला का उपयोग किया जाता है।

वात रोग (जोड़ों का दर्द): अश्वगंधा, शिलाजीत, और अभ्यंग चिकित्सा का प्रयोग।

पाचन संबंधी समस्याएँ: त्रिफला, सौंफ, और जीरा जैसे औषधीय तत्व।

त्वचा रोग: नीम, हल्दी, और चंदन का लेप।

हृदय रोग: अर्जुन की छाल और दालचीनी।

निष्कर्ष

धन्वंतरि चिकित्सा का उद्देश्य शरीर को बाहरी उपचार से नहीं बल्कि आंतरिक संतुलन और प्राकृतिक चिकित्सा के माध्यम से स्वस्थ बनाना है। इसमें व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, और भावनात्मक पहलुओं को स्वस्थ रखने पर जोर दिया जाता है। आयुर्वेद या धन्वंतरि चिकित्सा सिर्फ एक चिकित्सा प्रणाली ही नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है जो स्वास्थ्य और समग्र कल्याण को बढ़ावा देती है।

चरक संहिता

चरक संहिता आयुर्वेद का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसकी रचना महर्षि चरक ने की थी। यह ग्रंथ आयुर्वेद की मौलिक शिक्षा और चिकित्सा पद्धति का एक विस्तृत संग्रह है। इसमें विभिन्न रोगों के लक्षण, कारण, निदान और उपचार के साथ-साथ स्वस्थ जीवन जीने के नियम भी शामिल हैं। चरक संहिता में मानव शरीर, स्वास्थ्य और बीमारियों के बारे में गहरी जानकारी दी गई है और इसे आयुर्वेदिक चिकित्सा का आधार माना जाता है।

चरक संहिता की विशेषताएं

1. त्रिदोष सिद्धांत: वात, पित्त, और कफ को शरीर के तीन दोष मानकर इनकी असंतुलन स्थिति को रोग का कारण माना गया है।

2. स्वास्थ्य का महत्व: इसमें केवल रोगों का उपचार ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की सुरक्षा और उसके रख-रखाव पर भी जोर दिया गया है।

3. निदान और चिकित्सा: रोगों की पहचान और उपचार के लिए विभिन्न तरीकों का वर्णन किया गया है। जैसे पंचकर्म, औषधि निर्माण, आहार-विहार आदि।

4. आयुर्वेदिक चिकित्सा के आठ अंग: चरक संहिता में चिकित्सा के आठ प्रमुख अंगों का वर्णन किया गया है जिन्हें “अष्टांग आयुर्वेद” कहते हैं। ये अंग काय चिकित्सा, बाल चिकित्सा, ग्रह चिकित्सा, ऊर्ध्वांग चिकित्सा, शल्य चिकित्सा, दंश चिकित्सा, जर चिकित्सा, और वृष चिकित्सा हैं।

चरक संहिता का महत्व आज भी है, और इसे आयुर्वेदिक चिकित्सकों और शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

चरक संहिता में आठ खंड

चरक संहिता में आठ खंड या “अध्याय” (संहिता के हिस्से) हैं, जिन्हें “अष्टस्थान” के रूप में जाना जाता है। प्रत्येक अध्याय में आयुर्वेद के विभिन्न पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। ये आठ अध्याय इस प्रकार हैं:

1. सूत्र स्थान: इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांत, जीवनशैली, स्वास्थ्य और विभिन्न आहार-विहार संबंधी नियमों का वर्णन है। यह चरक संहिता का परिचयात्मक भाग है।

2. निदान स्थान: इसमें विभिन्न रोगों के कारण, लक्षण, और निदान के तरीकों का वर्णन किया गया है। यह भाग चिकित्सा में रोग की पहचान के लिए महत्वपूर्ण है।

3. विमान स्थान: इसमें विभिन्न रोगों के सिद्धांत, उनकी उत्पत्ति, और शरीर पर उनके प्रभाव का वर्णन किया गया है। इसके साथ ही आयुर्वेद में विभिन्न चिकित्सा विधियों का ज्ञान दिया गया है।

4. शरीर स्थान: इस भाग में मानव शरीर की संरचना, अंगों का कार्य, और शरीर विज्ञान का विस्तृत वर्णन है। यह शरीर के विभिन्न अंगों और प्रणालियों के बारे में जानकारी देता है।

5. इंद्रिय स्थान: इसमें इंद्रियों और उनकी कार्यप्रणाली के बारे में बताया गया है। यह रोगी के स्वास्थ्य की स्थिति का निर्धारण करने के लिए उपयोगी है।

6. चिकित्सा स्थान: इसमें विभिन्न रोगों के उपचार के तरीकों, औषधियों, और चिकित्सा प्रक्रियाओं का विस्तृत वर्णन है। यह चिकित्सा पद्धति का सबसे महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।

7. कल्प स्थान: इस अध्याय में औषधियों के निर्माण, उनके अनुपान (सेवन विधि) और चिकित्सा में प्रयोग के बारे में जानकारी दी गई है। इसमें विषविज्ञान और उसके उपचार का भी उल्लेख है।

8. सिद्धि स्थान: इस भाग में पंचकर्म चिकित्सा के सिद्धांत, प्रक्रियाएं और उनके लाभों का वर्णन किया गया है। इसमें चिकित्सा प्रक्रियाओं के सिद्धांत और चिकित्सीय परिणामों के बारे में चर्चा की गई है।

इन आठ अध्यायों के माध्यम से चरक संहिता आयुर्वेद के संपूर्ण ज्ञान को संरचित रूप में प्रस्तुत करती है और इसे एक संपूर्ण चिकित्सा ग्रंथ बनाती है।

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